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बिना तोड़ फोड़ के भी वास्तु सुधर संभव है- जानें कैसे

08-12-2015 Page : 1 / 1

बिना तोड़ फोड़ के भी वास्तु सुधर संभव है- जानें कैसे <br>

प्राय: कुछ लोग इस तरह का विज्ञापन करते हुए पाए जाते हैं कि बिना तोड़-फोड़ की वास्तु या बिना खर्चा किए वास्तु सलाह। मैंने यह भी देखा है कि बिना ज्योतिष के पर्याप्त ज्ञान के भी लोग वास्तु शास्त्र में हाथ आजमा रहे हैं। इन सब से कुल मिलाकर जातक का या क्लाइंट का नुकसान ही होता है।

इस बात को समझने के लिए हम मानव जन्म का उदाहरण ले सकते हैं, जिसमें एक शरीर स्वस्थ रूप से जन्म लेता है परन्तु बाद में खान-पान की गलतियों से, दुर्घटनाओं से या बीमारियों से उसमें विकृति आ जाती है। कुछ विकृतियां दवाओं से ही ठीक हो जाती हैं परन्तु कुछ में शल्य चिकित्सा करना आवश्यक हो जाता है। वास्तु शास्त्र में भी ऐसा ही है। एक वास्तुचक्र में स्थित जितने भी देवता हैं यदि उनका सम्मान करते हुए आप निर्माण कार्य करें अर्थात वास्तु शास्त्र का सम्पूर्णतया पालन करते हुए यदि निर्माण कार्य किये जाएं तो कभी भी तोड़-फोड़ की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। परन्तु यदि वास्तु शास्त्र के नियमों का उल्लघंन करते हुए निर्माण किए जाएं तो जिस देवता के क्षेत्राधिकार के ऊपर निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, वे देवता पीडि़त हो जाएंगे और वे तब तक पीडि़त रहेंगे जब तक कि उन पर हुए अनाधिकृत निर्माण या तो हटा नहीं दिये जाएं या उस भूखण्ड का कुछ हिस्सा काटकर या उस भूखण्ड में कुछ नया हिस्सा जोड़कर पीडि़त देवताओं के क्षेत्राधिकार को शिफ्ट कर दिया जाए या उस में परिवर्तन कर दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि जिस वास्तु पद में वास्तु दोष उपस्थित हैं, भूखण्ड का क्षेत्रफल बढऩे के कारण वह वास्तु पद किसी अन्य जगह होना सिद्ध हो जाए।

इस प्रक्रिया में यह भी शामिल है कि वास्तु दोष अब जिस नए वास्तु पद में आ गया है, उसके स्वामी देवता उस दोष से पीडि़त नहीं हो जाएं। यह देवता की प्रकृति और वास्तु दोष की प्रकृति पर निर्भर करता है। यह अत्यधिक कौशल का कार्य है और बिना कुशल वास्तुशास्त्री की मदद के नहीं किया जाना चाहिए।

जिस तरह से शल्य चिकित्सा आवश्यक है उसी तरह से यदि अन्य कोई उपाय उपलब्ध न हो, तो निर्मित भवन की शल्य चिकित्सा भी आवश्यक हो जाती है। मैं कुछ लोगों के इस तर्क से सहमत नहीं हूं कि दोष होने पर उसे नहीं हटाया जाए। केवल भ्रामक प्रचार का सहारा लेकर लोग इधर-उधर की बातें करते हैं और पीडि़त देवताओं का उद्धार होने से रह जाता है। हम देवताओं के प्रति अपराध करते हैं और अपराध के निवारण के लिए कोशिश भी नहीं करते। कोशिश में क्षमा प्रार्थना तो शामिल है ही, शल्य उद्धार या शल्य चिकित्सा भी शामिल है।

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