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कुंभ पर्व से जुड़े अति प्राचीन और अद्भुत रहस्य

23-04-2016 Page : 1 / 2

कुंभ पर्व से जुड़े अति प्राचीन और अद्भुत रहस्य

भारतीय खगोल शास्त्र और ज्योतिषीय गणनाओं की परम्परा के अनुसार कुम्भ पर्व का संबंध सूर्य अथवा सौर मण्डल की गति अथवा सौर मण्डल का सदस्य ग्रहों के विशेष राशियों में पहुंचने के विशेष अवसरों पर कुम्भ पर्व आयोजित होता रहा है। भारत में प्रत्येक 12 वर्षों के अन्तराल में हरिद्वार (गंगातट), प्रयाग (गंगा + यमुना + सरस्वती संगम तट), नासिक (गोदावरी तट), और उज्जैन (क्षिप्रा तट) में आयोजित होते हैं। स्कंद पुराण में महाकुम्भ पर्व के खगोलिय विधान का उल्लेख मिलता है। यथा:

पद्मिनी नायके मेषे कुंभाशि गते गुरौ।
गंगोद्वारे भवेद्योग: कुंभ नाम्रातदोत्तम:॥
अर्थात् सूर्य जब मेष राशि पर आए और गुरु ग्रह कुंभ राशि पर हो तब गंगाद्वार (हरिद्वार) में कुंभ पर्व का उत्तम योग बनता है।
प्रयाग (इलाहबाद) में कुंभ पर्व हेतु जब सूर्य मकर राशि तथा गुरु वृष राशि में हो ओर माघ मास हो तभी संयोग बनने का उल्लेख मिलता है।

उज्जैन में आयोजित कुंभ मेले को सिंहस्थ पर्व कहते हैं जब गुरु सिंह राशि पर अवस्थित हो तथा खगोलीय दृष्टिï से दस योग आवश्यक होने का उल्लेख मिलता है। नासिक में कुंभ पर्व को सूर्य एवं गुरु का सिंह राशि, पूर्णिमा तिथि और गुरुवार की स्थिति में होने  का उल्लेख मिलता है। हजारों वर्षोँ से लोक विश्वास का आधार वैदिक साहित्य, पौराणिक गाथाओं और सांस्कृतिक जीवनशैली के अनुसार कुंभ पर्व की प्रासंगिकता समय समय पर व्यक्त की जाती रही है।

श्रीमद् भागवत महापुराण में सागर-मंथन की प्रसिद्घ घटना के आलोक में जब देवों, असुरों के समन्वित प्रयास से समुन्द्र मंथन के द्वारा अमृत का कुंभ (घडा) प्राप्त हुआ था तो उसके लिए परम्परा युद्घ हुआ था। तब युद्घकाल में हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में उस कुंभ से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर गिर गई थीं। उन स्थानों पर अब इन विशेष खगोलीय ज्योतिषीय स्थिति में कुंभ पर्व आयोजित होते रहे हैं। इन चारों स्थानों पर कुंभ पर्वों की व्यवस्थित रूपरेखा आदि शंकराचार्य के द्वारा प्रस्तुत की गई मानी जाती है। कुंभ पर्व कब से आरम्भ हुए थे? इस प्रश्न की ऐतिहासिक प्राचीनता आज भी अनुमान तथा शोध का प्रसंग है। सम्राट हर्षवर्धन के द्वारा प्रयाग-कुंभ में सर्वस्व दान करने का प्राचीन उल्लेख मिलता है। कुंभ राशि जल की परिपूर्णता की प्रतीक मानी जाती है अत: भारत में अन्य नदियों के पास भी कुंभ मेलों के समान मेले आयोजित किये जाते रहे हैं। इन समान मेलों को आन्ध्र प्रदेश में तेलुगु भाषा में पुष्कर कहा जाता है। तमिलनाडु में कावेरी नदी के तट पर बृहस्पति के तुलाराशि में प्रवेश के अवसर पर कुंभ मेला आयोजित किया जाता है। यह कुंभ मेला महामखम् नामक तालाब के किनारे लगता है जो कि कुंभकोणम् नामक स्थान पर है। इस स्थान पर बहने वाली कावेरी नदी तीव्र कोण (मोड) बनाती है इसलिए इसका नाम कुंभ कोणम् है। सन् 1674 में आयोजित इस कावेरी कुंभ में तंजावुर के राजा रघुनाथ नायक ने स्वयं का स्वर्ण से तुलाभार करवाया था और उस स्वर्ण को वहाँ वितरित कर दिया गया था।

कावेरी कुंभ की पौराणिकता कुंभ (घडे) से उत्पन्न अगस्त्य ऋषि के सार्थक प्रयासों से जुडी है जब उन्होंने उत्तर भारत और दक्षिण भारत के भू-भागों को एक रूप सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और वैचारिक समन्वय का स्वरुप प्रदान करने का भगीरथ प्रयास किया था। यद्यपि भारतीय पौराणिक गाथाओं की प्राचीनता युगों और कल्पों (चार युगों के एक सम्पूर्ण चक्र को कल्प कहते हैं) से पहले तक का वर्णन करती हैं तथापि एक सहज जिज्ञासा उठती है कि पौराणिक ``सागर मंथन `` की घटना पहले घटी थी अथवा ``गंगावतरण`` की घटना पहले घटी थी? यदि गंगावतरण बाद में हुआ था तो  हरिद्वार अथवा गंगाद्वार पर कुंभ पर्व होने की सार्थकता कितनी प्राचीन है? ऐतिहासिक और पुरातात्विक इतिहास के अनुसार प्रचंड असुर सभ्यता (असीरिया) का उदय ई.पू. 2300 के  लगभग उत्तरी इराक में दजला नदी के तट पर हुआ था। इस असुर सभ्यता का निर्णायक पतन ई.पू. 612 में हुआ था। किन्तु  असुर साहित्य में सागर मंथन की गाथा और अमृत घट का उल्लेख अभी तक उजागर नहीं हुआ है। ऐसी पृष्ठ भूमि में कुंभ पर्व की प्राचीनता का प्रसंग सांस्कृतिक दृष्टिï से विश्वशोध को आमंत्रण देता है। परिस्थिति जन्य कारणों के संकेत से कुंभ पर्व की प्राचीनता के प्रसंग का संक्षेप यहाँ प्रस्तुत है। यथा:

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