होम : लेख :: जानें क्यों महत्वपूर्ण होता है गर्भ के धारण का समय

जानें क्यों महत्वपूर्ण होता है गर्भ के धारण का समय

05-04-2016 Page : 1 / 1

जानें क्यों महत्वपूर्ण होता है गर्भ के धारण का समय

आधान लग्र से तात्पर्य गर्भाधान लग्र से है अर्थात्ï जिस लग्र में गर्भ धारण हुआ। कुछ अपवादों को छोड़कर गर्भाधान का वास्तविक समय प्राय: लोगों को याद नहीं रहता लेकिन इस लग्र का महत्त्व तो है। जन्मकुण्डली जहां जातक के जीवन चक्र को स्पष्ट करती है, वहीं गर्भाधान लग्र जीव के गर्भस्थ जीवन तथा गर्भवती स्त्री का एवं परिवार के शुभाशुभ घटनाक्रम को स्पष्ट करती है।

आधान लग्र का प्रारम्भिक अवस्थाओं में यद्यपि ज्ञान ना रहे तो जन्म (गर्भस्थ शिशु की) लग्र से गणितीय विधि द्वारा आधान लग्न का निर्धारण किया जाता है। आधान लग्र के आधार पर शिशु के गर्भस्थ समय चक्र का परीक्षण करके जन्म लग्र की शुद्धता भी प्रमाणित की जाती है।

वर्तमान में तो जन्म का स्पष्ट समय आसानी से निर्धारित हो रहा है, जिससे कुण्डलियां सही बन रही है लेकिन प्राचीन समय में समय मापन यंत्र दुर्लभ थे। सो आभासी समय पर ही कुण्डली बनती थी। अब कुण्डली सही है या गलत इसका ज्ञान जन्म लग्र से आधान लग्र बनाकर शिशु के गर्भस्थ समय का अध्ययन करके किया जाता है।

आधान लग्र का निर्धारण

जन्म लग्र कुण्डली में जिस भाव में शनि हो उस भाव और गुलिक जिस भाव में हो उसका अंतर करके उसमें लग्र और नवम भाव का अंतर जोडऩे से जो राशि आदि प्राप्त होती है, उस राशि तुल्य मास, अंश तुल्य दिन तथा कला तुल्य घटियां और विकला तुल्य मिनटों पर (जन्म से पूर्व) गर्भाधान होता है। उस समय के आधार पर गर्भाधान लग्र निर्धारित हो जाती है।

यदि जन्म लग्रेश, जन्म कुण्डली में लग्र से सप्तम के मध्य हो तो उपरोक्त राशि अंशों में चंद्र के राशि अंश भी जोड़ देने चाहिए।
यद्यपि इस नियम का हमने अधिक परीक्षण नहीं किया, फिर भी पााठकों के प्रयोगार्थ विधि प्रस्तुत है। पाठक विधि का उपयोग कर प्राप्त फलों से हमें अवगत करावें।

आधान कुण्डली फल

आधान कुण्डली की ग्रह स्थिति गर्भस्थ शिशु का घटनाक्रम व्यक्त करती है। यथा- योग पढऩे से पूर्व जो महत्त्वपूर्ण बात जाननी है वह यह है कि गर्भ के प्रथम मास से दशम मास तक के स्वामी ग्रह क्रमश: शुक्र, मंगल, गुरु, सूर्य, चंद्रमा, शनि, बुध, गर्भाधान लग्र का स्वामी, चंद्रमा तथा सूर्य होते हैं।
  1. आधान कुण्डली में यदि सूर्य से सप्तम में मंगल, शनि हो तो अपने मासों में गर्भस्थ शिशु के पिता को रोगी करते हैं। सूर्य से सप्तम मंगल या शनि दोनों में से एक भी हो तो पिता को अपने (ग्रह के) मास में रोगी करते है। उक्त योग हो और ग्रह से संबंधित मास में पिता को रोग हुआ हो तो जन्म लग्र शुद्ध होती है। इसी तरह अन्य योग भी परीक्षा के है ।
  2. यदि चंद्रमा से सप्तम में मंगल, शनि दोनों अथवा मंगल या शनि दोनों में से एक भी हो तो अपने मास में माता को रोग होता है या बीमारी होती है।
  3. सूर्य से द्वितीय तथा द्वादश भाव में मंगल तथा शनि हो तो मंगल या शनि में जो बलवान हो उसी के मास मेें पिता को मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त होता है।
  4. यदि चन्द्र से द्वितीय तथा द्वादश में मंगल तथा शनि हो, इनमें जो बलवान हो उसी के मास में माता को मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त होता है।
  5. इसी प्रकार सूर्य अथवा चंद्र के साथ मंगल (या शनि) हो तथा शनि (या मंगल) देखे तो जो बली होता है। उस ग्रह के मास में माता या पिता को कष्टï मिलता है। इस प्रकार आधान लग्र की उपयोगिता स्वीकार की जाती है। यद्यपि आजकल इसका उपयोग नहीं हो रहा है पर ज्योतिषियों को इसका उपयोग करना चाहिये।
- पंडित श्रीराम शर्मा
05-04-2016

Subscribe to NEWS and SPECIAL GIFT ATTRACTIVE

Corporate Consultancy
Jyotish Manthan
International Vastu Academy
Jyotish Praveen