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मंगल ग्रह कब किसे करते है पीड़ित ?

25-04-2017 Page : 1 / 1

मंगल ग्रह कब किसे करते है पीड़ित ?

मंगल को लेकर वराहमिहिर ने कुछ बहुत अच्छी बातें कही हैं। उन्होंने भौमचाराध्याय में मंगल के पाँच मुख बताये हैं-
  1. ऊष्णमुख मंगल के अंतर्गत जिस नक्षत्र में मंगल उदय हो उससे सप्तम, अष्टम या नवम नक्षत्र में जाकर यदि मंगल वक्री हो जायें तो इस मंगल के उदयकाल में अग्निकर्म करने वाले व्यवसायियों को पीड़ा होती है।
  2. उदयकालीन नक्षत्र से दशम, एकादश या द्वादश नक्षत्र में मंगल वक्री हों तो वह अश्रुमुख कहलाता है और मंगल की ऐसी वक्रगति रसों में दोष पैदा करती है तथा रोग वृद्धि एवं अनावृष्टि उत्पन्न करती है।
  3. जिस नक्षत्र में मंगल अस्त हों, उससे 13वें या 14वें नक्षत्र में जाकर वक्री हो तो वह व्यालमुख कहलाता है। इससे शूकर, कुत्ता, सर्प, मृग आदि से पीड़ा होती है परन्तु संसार में सुभिक्ष होता है एवं अन्न उत्पादन बढ़ता है।
  4. जिस नक्षत्र में मंगल अस्त हों, उससे 15वें या 16वें नक्षत्र में जाकर मंगल वक्री हो जायें तो वह रुधिरानन कहलाते हैं तथा जब वह उदय हों तो मुख का रोग और भय उत्पन्न होता है परन्तु वर्षा अच्छी होती है।
  5. जिस नक्षत्र में मंगल अस्त हों उससे 17वें या 18वें नक्षत्र में जाकर मंगल वक्री हो जायें तो असिमुसल मंगल कहलाते हैं।
ऐसे मंगल के वक्री होने पर चोरों से पीड़ा, अनावृष्टि और शस्त्र भय होता है।
इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के भी कई योग शास्त्रों में मिलते हैं। यदि पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में मंगल उदय होते हों परन्तु उत्तराषाढ़ा में जाकर वक्री होते हों और बाद में रोहिणी में जाकर अस्त होते हों तो तीनों लोकों को पीड़ा देते हैं।
 
यदि श्रवण नक्षत्र में मंगल उदय हों परन्तु बाद में पुष्य नक्षत्र में जाकर वक्री हों तो शासनाध्यक्षों को पीडि़त करते हैं तथा जिस नक्षत्र में उदय हों तो कूर्म चक्र में वर्णित उस नक्षत्र की दिशा और देशों को पीड़ा देते हैं।

यदि रोहिणी नक्षत्र के दक्षिण से मंगल विचरण करते हों तो सूखा पड़ता है और महंगाई बढ़ती है। यदि धूमयुक्त या शिखायुक्त मंगल के दर्शन हों तो ऐसे मंगल बहुत अशुभ बताये गये हैं। मंगल का रोहिणी का शकट भेद बिल्कुल ही शुभ नहीं माना जाता है। रोहिणी नक्षत्र, श्रवण, मूल, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद या ज्येष्ठा के मंगल को मेघों का नाश करने वाला बताया गया है।

मंगल जब शुभ्रवर्ण हों या उनकी रक्तकांति में किसी कारण से कमी आवे या निर्बलता आवे तो उसे शुभ माना गया है। स्पष्ट सुंदर किरणों वाले, अशोक पुष्प के समान, ताम्रवर्णी मंगल यदि उत्तर क्रांति में हों तो राजा और प्रजा दोनों को संतोष प्रदान करते हैं, ऐसा ग्रंथों में मिलता है।

मंगल का अस्त या वक्री होना हिंसा को बढ़ाता है तथा घटनाओं को जन्म देता है। दाम्पत्य जीवन में मंगल एक तरफ मांगल्य के कारक हैं परन्तु कुछ स्थानों में स्थित रहकर अमंगल को जन्म देते हैं।

जन्म लग्न से द्वादश, लग्न में, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम में मंगल की स्थिति शुभ नहीं मानी गई है, यद्यपि इसके अपवाद ग्रंथों में मिलते हैं। हमारा अनुमान है कि यह वैधव्य दोष क्षीण हो जाता है यदि मंगल ग्रह पर शुभ ग्रहों का प्रभाव अत्यधिक हो, फिर भी यह देखने में मिलता है कि मंगल ग्रह का अशुभ प्रभाव नष्ट होने पर वह कोई अन्य छोटी पीड़ा जीवन में देते रहते हैं।

शरीर में व्रण, रक्ताल्पता, रक्ताधिक्य, रक्तस्राव, दौर्बल्य, अधिक ऊष्मा, जठराग्नि, मंदाग्नि, आंतरिक व्रण, क्रोध, अविवेक, हिंसा, शल्य चिकित्सा, शस्त्राघात, क्रूर मृत्यु इत्यादि बुरे लक्षण तब आते हैं जब मंगल देवता निर्बल हों, शत्रुक्षेत्री हों या ज्योतिष की भाषा में पापी हों परन्तु यही मंगल जब षोडश वर्गों या षड्ïबलों में उत्तम हों तो नेतृत्व, साहस, अच्छा स्वास्थ्य, उत्तम विवेक, अधिक आयु और निरोगी काया देते हैं। मंगल कल्याणकारी होने पर उच्चकोटि के गुण और वचनबद्धता जैसे दुर्लभ गुण देते हैं, वही मंगल अशुभ होने पर झूठ, फरेब और चौर कर्म देते हैं।

मंगल और गुरु का परस्पर संबंध दाम्पत्य जीवन में बाधक माना गया है। यदि किसी विवाहित युगल में किसी में मंगल और किसी में गुरु प्रधान हों तो उनके मानसिक स्तर में अंतर मिलता है, जो दाम्पत्य जीवन में सौहाद्र्र में कमी लाता है। मंगल शक्ति के प्रतीक हैं और बृहस्पति ज्ञान के, अत: शास्त्रों में इनका उचित अनुपात ही शुभ माना गया है। पाप नक्षत्रों और पापग्रहों के साथ मंगल अधिक उग्र हो जाते हैं परन्तु समानधर्मा पापग्रहों या क्रूर ग्रहों जैसे कि सूर्य के साथ मंगल अत्यंत शुभ परिणाम देते हैं।

- पद्मा शर्मा, प्रकाशक ज्योतिष मंथन
25-04-2017

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