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जैमिनी ज्योतिष पाराशरीय ज्योतिष से भिन्न कैसे ?

23-11-2018 Page : 1 / 1

जैमिनी ज्योतिष पाराशरीय ज्योतिष से भिन्न कैसे ?

जैमिनि ज्योतिष पाराशर प्रणीत ज्योतिष से कुछ भिन्न है। इसकी कुछ विशेषताएँ निम्र हैं।
1. कारक :- राहु और केतु को छोड़कर अन्य सभी सात ग्रह अपने-अपने अंश, कला, विकला के अनुसार अवरोही क्रम में निम्रलिखित सात कारक बनते हैं:
  •     आत्मकारक
  •     अमात्यकारक
  •     भ्रातृकारक
  •     मातृकारक
  •     पुत्रकारक
  •     ज्ञातिकारक
  •     दाराकारक
2. दृष्टियां :- जैमिनी पद्धति में राशियों की दृष्टि का महत्व है। सभी चर राशियां अपने समीपवर्ती अगली स्थिर राशि को छोड़कर अन्य सभी स्थिर राशियों को देखती है, सभी स्थिर राशियां अपने समीपवर्ती पिछली चर राशि को छोड़कर अन्य सभी चर राशियों को देखते हैं और सभी द्विस्वभाव राशियां परस्पर देखती है। इस प्रकार इस पद्धति में प्रत्येक राशि अन्य तीन राशियाँ को देखती है।
3. दशाएँ :- जैमिनी पद्धति की दशाएं राशि दशाओं के रूप में जानी जाती है। पाराशरी ज्योतिष पद्धति में दशाएं नक्षत्र पर आधारित होती है और वे नक्षत्र के स्वामी ग्रह के नाम से जानी जाती है। उसके विपरीत इस पद्धति में राशियों पर आधारित कुल बारह दशाएं होती है, यथा मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन।
4. दशाओं का क्रम :- इन बारह दशाओं में से छ: दशाओं का क्रम सव्य है और शेष छ: का अपसव्य।
5. दशाओं की अवधि: इस पद्धति में किसी राशि की दशा की अधिकतम अवधि बारह वर्ष की और कम से कम एक वर्ष की होती है। इस संबंध में कुछेक विवाद है, जिनकी चर्चा आगे की जाएगी।
6. योग :- जैमिनी पद्धति के योग यथा राज योग, धन योग, अरिष्ट योग आदि पाराशरी पद्धति के योगों में भिन्न होते हैं।
7. कारकांश :- आत्मकारक (जिस ग्रह की सर्वाधिक अंश हो) की नवमांश राशि कारकांश कहलाती है। जिसका प्रयोग विभिन्न महत्वपूर्ण भविष्यवाणियां करने हेतु किया जाता है।
8. पद या आरुढ़ लग्न :- कारकांश की तरह पद, लग्न का प्रयोग भी प्रमुख भविष्यवाणियों को लिए किया जाता है। लग्नेश लग्न से जितनी भाव आगे स्थित हो, उस भाव से उतने ही भाव आगे गिनने पर जो भाव आए उसे पद लग्न कहते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी जातक का लग्नेश लग्न से चतुर्थ भाव में हैं तो चतुर्थ भाव से चौथा भाव अर्थात् सप्तम भाव उस जातक का पद लग्र कहलाएगा।
9. उप-पद लग्न :- द्वादशेश द्वादश भाव से जितने भाव आगे स्थिर हो, उस भाव से उतने ही भाव अगे गिनने पर जो भाव आए वह उप-पद कहलाएगा।
कारक
जैमिनी ज्योतिष में प्रथम पाठ कारकों के बारे में हैं, इसे भलीभॉति समझ लेना चाहिए। इसके प्रयोजनार्थ निम्रलिखित प्रक्रिया अपनानी चाहिए:
  1. सभी ग्रहों के अंशों तथा कला आदि की सही-सही गणना कर लें, यदि आवश्यकता पड़े तो विकला तक गणना कर लें।
  2. राहु तथा केतु को छोड़कर अन्य सभी सात ग्रहों को उनके अंशों के आधार पर अवरोही क्रम में रखते हुए अर्थाात् सबसे अधिकतम अंशों वाले ग्रह को सबसे पहले और सबसे कम अंशों वाले ग्रह को सबसे अंत मे रखकर एक तालिका बना लें।
  3. अब, अधिकतम अंशों वाले ग्रह से आरम्भ करके न्यूनतम अंशों वाले ग्रह तक इनके नाम क्रमश: इस प्रकार है :
  • आत्मकारक
  • अमात्यकारक
  • भ्रातृकारक
  • मातृकारक
  • पुत्रकारक
  • ज्ञातिकारक
  • दाराकारक
स्थिर कारक :- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि तथा राहु व केतु आदि ग्रहों का अपने-अपने सुप्रसिद्ध कारकत्व के लिए प्रयोग करना सदैव निरापद रहता है। इन्हें स्थिर कारकों के रूप में जाना जाता है। यहां पर पुन: एक और विभेद किया जाता है। मैंने हजारों जन्मकुण्डियों पर जांच करने के बाद यह पाया कि श्री सीताराम झा ने जो विचार (पृष्ठ 110 पर) अभिव्यक्त किया है, वह एक बड़ी सीमा तक विश्वसनीय है। उनका विचार संक्षेप में इस प्रकार है:
  1. सूर्य और शुक्र में से जो भी ग्रह शक्तिशाली हो, वह ग्रह पिता का कारक होता है।
  2. चंद्रमा और शुक्र में से जो भी ग्रह शक्तिशाली हो, वह ग्रह माता का कारक हाता है।
  3. मंगल ग्रह छोटे भाई-बहिन, बहनोई, साला और यहां तक कि मां का भी कारक होता है।
  4. बुध ग्रह चाचा-चाची, ताऊ-ताई, फूफा-बुआ, मामा-मामी और मौसा-मौसी का कारक होता है।
  5. बृहस्पति ग्रह दादा का कारक होता है।
  6. शुक्र ग्रह जीवनसाथी का कारक होता है।
  7. शनि ग्रह पुत्रों का कारक होता है (यह बात मुझे कुछ आश्चर्यजनक सी प्रतीत होती है)।
  8. राहु ग्रह दादा और केतु नाना का कारक होता है।
  9. केतु ग्रह दादी और नानी का कारक होता है।
- ज्योतिष मंथन पत्रिका

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