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अमर उजाला ज्योतिष महाकुम्भ - 2018

28-04-2018 Page : 1 / 1

अमर उजाला ज्योतिष महाकुम्भ - 2018

एक वास्तु चक्र में अंदर की तरफ 45 देवता होते हैं। वे सभी अपने-अपने चरित्र के अनुसार परिणाम देते हैं। देवताओं के चरित्र के बारे में जानने के लिए हमें पौराणिक कहानियाँ पढऩी चाहिए। हम जिस देवता के स्थान का उल्लंघन करेंगे वह विपरीत परिणाम देगें और अपने चरित्र के अनुरूप फल देंगे। यदि देवताओं के अनुकूल निर्माण कार्य करेंगे तो वह शुभ फल प्रदान करेंगे। उदाहरण के तौर पर पूर्व दिशा मध्य से ईशान कोण के मध्य में स्थित जयंत नाम के देवता है। वे देवराज इंद्र तथा उनकी पत्नी शची जो कि दैत्य राज पुलोमा की पुत्री थी, से उत्पन्न हुए। अत: उनमें दैवीय के अलावा आसुरी संस्कार भी मौजूद थे। आज का जो पूंजीवाद है उसमें थोड़ा बहुत शोषण का अंश छिपा रहता है। पहले तो पूंजीवादी अपने उत्पादन की लत लगाता है और बाद में स्वयं मूल्य निर्धारण करता है और लाभ का पूरा अंश अपने कर्मचारियों को प्रदान नहीं करता है। यह पूंजीवाद पर आधारित व्यवस्था है अत: इस लाभ में आसुरी संस्कार जनित कार्य प्रणाली छिपी हुई है। यदि किसी को पूंजीपति बनना है तो जयन्त में जो दैवीय और आसुरी संस्कार निहित हैं उनका प्रयोग अपने जीवन में करना होगा। अत: आधुनिक ज्योतिषी को यदि वास्तुशास्त्र का अभ्यास करना है तो वास्तुचक्र में स्थित देवताओं के व्यक्तिगत चरित्र का अच्छी तरह अध्ययन कर लेना चाहिए। जिस देवता को प्रसन्न करेंगे वह अनुकूल परिणाम देंगे और जिस देवता के स्वभाव के प्रतिकूल निर्माण करेंगे वह खराब परिणाम देंगे।

प्राचीन वास्तुशास्त्रियों ने भी शास्त्रों पर आधारित व्यवस्थाओं पर बहुत सारे नये प्रयोग किए हैं। उदाहरण के लिए चित्तौड़ के महाराणाओं के वास्तुशास्त्री मंडनसूत्रधार ने महाराणा कुम्भा का महल, जो कि चित्तौड़ की पहाडिय़ों पर स्थित है, वास्तु चक्र के पृथ्वीधर नामक स्थान में बनाया है। आधुनिक जयपुर के राजमहल भी वास्तुचक्र के पृथ्वीधर नामक स्थान में स्थित हैं। इन वास्तुशास्त्रियों की मान्यता थी कि वास्तुचक्र के ब्रह्म स्थान के तुरन्त उत्तर में स्थित षटपदिक देवता पृथ्वीधर के स्थान में यदि निर्माण कार्य किये जाएं तो वह व्यक्ति समस्त पृथ्वी को धारण करेगा या अधिक भूमि का उपभोग करेगा परन्तु मुगल राजवंश में अकबर के समय एक और नया प्रयोग हुआ था। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी नामक स्थान पर महारानी जोधाबाई के आगमन के पश्चात जो महल बनें उनमें भारतीय वास्तुकला का जमकर प्रयोग हुआ। सम्भवत: महारानी जोधाबाई के महल का निर्माण करने वाले कारीगर जयपुर आमेर से थे। अत: जोधाबाई के महल दक्षिण के विवस्वान के क्षेत्र में बनाये गये। विवस्वान द्वादश आदित्य में से एक हैं और विश्वकर्मा की पुत्री का विवाह उनसे हुआ। फतेहपुर सीकरी के महलों में पश्चिम दिशा में बीरबल और टोडरमल के महल बनाये गये। हम सब जानते हैं कि मुगल राजवंश का विस्तार उसके बाद ही हुआ और वास्तुक्षेत्र में महारानी जोधाबाई के समय में हुये प्रयोगों ने उन्हें विश्व विख्यात बना दिया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुगलकाल के प्रमुख पुरोधा सम्राट अकबर का दरबार संसार का सबसे धनी दरबार था। इस राजवंश के राजाओं ने सबसे अधिक वर्षों तक राज किया। महाराणा प्रताप और अन्य राजा इतना अधिक सफल नहीं रहे और कालान्तर में उन्हें राज्य भी खोना पड़ा।

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