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लक्ष्मी जी प्रसन्न किस पर...?

17-10-2019 Page : 1 / 1

लक्ष्मी जी प्रसन्न किस पर...?

प्रत्येक व्यक्ति की यह प्रबल आकांक्षा रहती है कि उस पर लक्ष्मी जी जीवन भर प्रसन्न बनी रहेें अर्थात् निरन्तर धन का आगमन होता रहे और सुख व सम्पत्तियों में वृद्धि होती रहे। लक्ष्मी जी उनके ऊपर ही प्रसन्न रहती है, जिनमें लक्ष्मी जी को प्राप्त और उन्हें स्थायी बनाए रखने के आवश्यक गुण और संस्कार निहित होते हैं। कर्मकाण्ड के अन्तर्गत पूजा में लिए गए संकल्प में यह कामना की जाती है कि अप्राप्त लक्ष्मी हमें प्राप्त होवे तथा प्राप्त लक्ष्मी चिरकाल तक स्थायी बनी रहे। भवन निर्माण के दौरान भी नींव स्थापना व गृह प्रवेश के समय घर में स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए कर्मकाण्ड के प्रयोग करवाए जाते हैं। इसी तरह व्यापार कार्यालयों में लक्ष्मी वृद्धि के लिए कुछ इसी तरह के प्रयोग किए जाते हैं।

लक्ष्मी जी हमेशा प्रसन्न रहे, इसके लिए जन्म पत्रिका का शक्तिशाली होना आवश्यक है। जन्म पत्रिका के केन्द्र व त्रिकोण भाव धन-सम्पदा में वृद्धि कराते हैं। इन्हीं भावों के परस्पर संयोजन से राजयोग का निर्माण होता है, जो कि एक तरह से लक्ष्मी योग का ही पर्याय है, बशर्ते कि जन्म पत्रिका में राजयोग भंग करने वाले दुर्योग नहीं हो। प्राय: जिनकी जन्म पत्रिकाओं में अच्छे राजयोग होते हैं, उन्हें सुख-सुविधाओं के अच्छे साधन प्राप्त होते हैं। यदि राजयोग में शुभ ग्रहों का अधिक प्रभाव होता है तो निरन्तर धन-सम्पदा की प्राप्ति होती रहती है और ऐसे व्यक्ति मानी, यशस्वी और प्रतिष्ठित होते हैं।
यदि धनेश द्वितीय भाव में हो अथवा केन्द्र, त्रिकोण में हो तो धन वृद्धिकारक होते हैं। धन भाव में शुभ ग्रह धनप्रद माने गये हैं। यदि धन भाव में शुभ ग्रह या धनेश शुभ युक्त या दृष्ट हो तो धन लाभ होता रहता है।

बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार -

धनेशे लाभभावस्थे लाभेशे वा धनं गते। तावुभौ केन्द्रकोणस्थौ धनवान् मानवो भवेत्।।
यदि धनेश एकादश स्थान में हो या एकादशेश धन स्थान में हो अथवा ये दोनों केन्द्र-त्रिकोण में स्थित हो तो निरन्तर धन की वृद्धि होती रहती है।

धनेशे केन्द्रराशिस्थे लाभेशे तत् त्रिकोणगे। गुरुशुक्रयुते दृष्टे धनलाभं दिशेद् बुध:।।
धनेश लग्न में हो तथा लाभेश, धनेश से त्रिकोण में हो साथ में गुरु या शुक्र की दृष्टि या युति हो तो धन लाभ होता रहता है।

स्वभोच्चस्थे धनाधीशे गुरुदृष्टयुते जन:। परोपकारी ख्यातश्च विज्ञेयो जनपोषक:।।
धनेश अपनी उच्चराशि में हो तथा बृहस्पति के साथ युत या दृष्ट हो तो मनुष्य परोपकारी, विख्यात व बहुत से लोगों का पोषक होता है।

केन्द्रत्रिकोणगै: सौम्यै: पापैश्च त्रिषडायगै:। विलग्नेशे बलयुते हीनवंशोऽपि राज्यभाक्।।
सभी शुभ ग्रह केन्द्र व त्रिकोण में तथा सभी पाप ग्रह 3, 6, 11 भावों में बलवान हो तथा लग्नेश बलवान हो तो हीन वंश में भी उत्पन्न व्यक्ति राजा होता है।

धनदौ धर्मधीनाथौ ताभ्यां ये वा युता ग्रहा:। तेऽपि स्वस्वदशाकाले धनदा नात्र संशय:।।
पंचमेश व नवमेश तथा इन दोनों से युक्त ग्रह धनदायक हैं। ऐसे ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा में धन लाभ के लिए संशय नहीं करना चाहिए। निश्चित रूप से धन प्राप्त होता है।

लाभाच्च लाभगे जीवे बुधचन्द्रसमन्विते। धनधान्याधिप: श्रीमान रत्नाद्याभरणैर्युत:।।
एकादश से एकादश अर्थात् नवम भाव में गुरु, बुध व चंद्र हों तो मनुष्य धन-धान्य युक्त रत्नों व आभूषणों का स्वामी होता है।

पंचमे भृगुजक्षेत्रे तस्मिन् शुक्रेण संयुते। लाभे भौमेन संयुक्ते बहुद्रव्यस्यनायक:।।
पंचम भाव में शुक्र की राशि हो तथा शुक्र वहीं स्थित हों एवं लाभ स्थान में मंगल हों तो मनुष्य बहुत धनी होता है।

पंचमे तु बुधक्षेत्रे तस्मिन् बुधयुते सति। चन्द्रे भौमे गुरौ लाभे बहुद्रव्यस्य नायक:।।
पंचम में स्वक्षेत्री बुध हों तथा चंद्र, मंगल, गुरु एकादश स्थान में हो तो मनुष्य बहुत धनी होता है।

पंचमे च रविक्षेत्रे तस्मिन् रवियुते सति। लाभे शनीन्दू जीवाढ्ये बहुद्रव्यस्य नायक:।।
पंचम में स्वक्षेत्री सूर्य हों तथा लाभ स्थान में शनि, चंद्र व गुरु हों तो मनुष्य बहुत धनी होता है।

पंचमे तु शनिक्षेत्रे तस्मिन् शनियुते सति। लाभे रवीन्दुसंयुक्ते बहुद्रव्यस्य नायक:।।
पंचम में शनि स्वक्षेत्री हों तथा लाभ स्थान में सूर्य, चंद्र साथ हों तो मनुष्य बहुत धनी होता है।

पंचमे तु कुजक्षेत्रे तस्मिन् कुजयुते सति। लाभस्थे भृगुपुत्रे तु बहुद्रव्यस्य नायक:।।
पंचम में मंगल स्वक्षेत्री हों तथा एकादश में शुक्र हों तो मनुष्य बहुत बड़े धन का स्वामी होता है।

पंचमे तु शशि क्षेत्रे तस्मिन् शशिभुते सति। शनौ लाभस्थिते जातो बहुद्रव्यस्य नायक:।।
पंचम में चंद्र्रमा स्वक्षेत्री हो तथा लाभ भाव में शनि हों तो मनुष्य बहुत धनी होता है।

उपर्युक्त सभी योगों में महर्षि पराशर ने पंचम भाव के बलवान होने को धनी योगों में शामिल किया है। पंचमेश से बनने वाले धन योगों में संतान भी परिवार की धन सम्पदा बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है। इन सभी योगों में पंचम और एकादश भावों के संयोजन से बनने वाले सम-सप्तक योगों को धनी योगों की संज्ञा दी है। इसी तरह से चतुर्थ व दशम भावों के परस्पर संयोजन से बनने वाले सम-सप्तक योगों को भी विभिन्न होरा ग्रंथों में अच्छे धनी व संपत्तिशाली योगों में शामिल किया गया है। चतुर्थ व दशम भाव से बनने वाले योग सम्पत्ति प्रदायक होते हैं, जिसमें भूमि, भवन, वाहन, आभूषण, रत्न, बहुमूल्य वस्तुएं मुख्य रूप से शामिल हैं।

-पं. कृष्ण भारद्वाज

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