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अन्तराष्ट्रीय गीता महोत्सव 2017।

12-12-2017


मैं भाग्यशाली हूँ कि मैं जहां रहता हूँ जयपुर में वहाँ से सौ कि.मी. के अन्दर-अन्दर वह स्थान है जिसका नाम विराट नगर है। पाण्डवों की अज्ञातवास के बाद विजय यात्रा वहां से शुरु हुई और जहां मैं आपके बीच खड़ा हूं, वहां समाप्त हुई। इसी धरती पर गीता का वह महान उपदेश जो इस धरती पर दिया गया, सारे संसार में मान्य हो रहा है। कृष्ण की लीलाओं के इन क्षेत्रों में मैं अपने आप को यहां आकर भाग्यशाली मानता हूँ।
भगवान कृष्ण द्वारा गीता का प्रथम उपदेश विवस्वान (सूर्य) को दिया गया था जो कि द्वादश आदित्य में से एक है। उन्होंने मनु को दिया और मनु ने एक इक्क्षाकु को दिया। परन्तु विवस्वान को दिव्य दृष्टि की आवश्यकता नहीं थी और ना ही उन्होंने भगवान के विश्वरूप के दर्शन की अपेक्षा की। इसके लाखों वर्ष बाद कुरुक्षेत्र की रणभूमि में आज से 5124 वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। इसके बाद पुन: गीता का उपदेश तब देना पड़ा जब युद्ध समाप्ति के पश्चात भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अब मेरा यहाँ कोई कार्य नहीं रह गया है अत: मैं द्वारिका जाना चाहता हूँ। इस पर अर्जुन ने कहा कि - हे प्रभु! आपके दिए गए उपदेश को मैं भूल सा गया हूँ, कृपया मुझे पुन: उपदेश दें। इस पर भगवान कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन पुन: वह का वह उपदेश देना तो अब मेरे लिए भी सम्भव नहीं है परन्तु उसमें से कुछ ज्ञान अब मैं पुन: प्रदान कर रहा हूँ। यह प्रकरण `अनुगीता` के नाम से प्रसिद्ध है।

गीता का उपदेश करते हुए, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को हर तरह से उस निराशा से निकालने की कोशिश की जिसके कारण वह युद्ध नहीं करना चाहता था। परन्तु इसके बाद भी अर्जुन के मन में संदेह बना रहा और उसने भगवान कृष्ण से भी अपना वह स्वरूप दिखाने की प्रार्थना की, जो कि उन्हें ईश्वर सिद्ध कर सके। भगवान कृष्ण ने कहा कि मेरे उस ऐश्वर्य को तुम सहन नहीं कर पाओगे, इसीलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान कर रहा हूँ। भगवान कृष्ण ने जो विश्व रूप दिखाया उसमें उनका कालरूप या संहारक का रूप प्रथम दिखा, जिसमें समस्त सृष्टि, देवी-देवता, जीव-जगत तथा पाण्डवों को छोड़कर समस्त कौरव और दोनों ओर की सेनाएँ उस विकराल अग्रि में जाती हुई प्रतीत हुई। सारे ग्रह नक्षत्र, हजारों सिर-शरीर, सब कुछ उस अग्रि में जाता हुआ प्रतीत हुआ। इस विश्व रूप में अर्जुन को तीनों काल के दर्शन हुए। अर्जुन के विस्मय का ठिकाना नहीं रहा, परन्तु वह तो ईश्वर के उस मनोरम रूप को देखना चाहते थे, जिसकी वे कल्पना किया करते थे। फलत: कृष्ण ने अपना वह चतुर्भुजी सौम्य विष्णु स्वरूप दिखाया जिसमें अर्जुन को समस्त सृष्टि नजर आई। यह अद्भुत था। अर्जुन को विश्वास दिलाने के लिए कि वे ही साक्षात् ईश्वर हैं कृष्ण ने उस सम्मोहित कर देने वाले विश्वरूप को प्रकट किया। उसके पश्चात् कृष्ण ने अपने उस द्विभुजी नित्य कृष्ण स्वरूप को दर्शाया जिससे कि अर्जुन को विश्वास हो सके कि वे ही ईश्वर हैं।
अर्जुन ने ईश्वर के उस काल रूप को देखा जिसमें महाभारत युद्ध के सारे ही योद्धा मरे हुए दिखाई दे रहे थे। अर्जुन कृष्ण के इस वचन का विश्वास कैसे करें कि यह समस्त पहले ही मारे जा चुके हैं, अर्जुन को मात्र निमित्त है। इसीलिए इस विश्वरूप से अर्जुन यह विश्वास कर सका कि इन्हें मारने से तथा समस्त बधु-बांधवों के विनाश से कोई पाप नहीं लगेगा। अर्जुन को केवल कर्म करना चाहिए।  यह निष्काम कर्म होना चाहिए।

समस्त योनियों में ईश्वर के अनन्त ऐश्वर्य को देखने की क्षमता नहीं होती। मानव की समस्त इन्द्रियाँ भी देवताओं का साक्षात नहीं कर पातीं। इस पृथ्वी पर भी ऐसे उदाहरण हैं जैसे कि चमगादड़ जिस ध्वनि को उत्पन्न करके यात्रा करता है, उसे मानव के कान नहीं सुन पाते। जब देवता प्रकट होते हैं तो ऐसा नहीं है कि उनका दैवीय शरीर पृथ्वी लोक में आकर पुन: अणु संयोजन कर लेता हो और दर्शन देता हो। वे अद्भुत गति के स्वामी हैं और अनन्त क्षमता रखते हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन, न्यूटन और आइंस्टीन परम्परा तो मानती ही है, अब एक नया सिद्धान्त और आ रहा है, जिसका नाम स्ट्रिंग सिद्धान्त (String Theory)  है। इस सिद्धान्त को देने वाले यह मानने लगे हैं कि कुल आयामों की संख्या 11 से 26 के बीच में हो सकती है। हम लोग त्रिआयामी विश्व में रहते हैं जिसकी गति सूर्य किरणों की गति से अधिक नहीं हो सकती। इसीलिए किसी अन्य ब्रह्माण्ड से हमारे ब्रह्माण्ड तक कोई यात्रा अगर सूर्य किरणों की गति से की जाए तो सम्भव ही नहीं है। परन्तु तीन आयाम के ऊपर की गति प्राप्त कर ली जाए तो यह यात्राएँ सम्भव हैं। ईश्वर ही नहीं देवता भी उस दिव्य गति को प्राप्त हैं जो कि चौथा आयाम, जिसे कि टाइम स्पेस कहा जाता है, की गति से या इससे ऊपर के आयाम की गति से सम्भव है। देवता या उनसे ऊपर ईश्वर एक ब्रह्माण्ड से दूसरे ब्रह्माण्ड की यात्रा क्षण मात्र में कर सकते हैं। नारद जैसे मुनि को भी यह गति प्राप्त थी।
आधुनिक वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि समय का विस्तार होता है तथा वह धीमा या तेज हो सकता है। इसीलिए अनन्त ब्रह्माण्ड में यात्रा करने पर समय का विस्तार हो जाता है तो वहाँ का एक क्षण भी मत्र्य  लोक के सैंकड़ों वर्षों के बराबर हो सकता है। सतयुग में रैवन्तक अपनी पुत्री रेवती के विवाह के लिए ब्रह्मा तक पहुंच गये थे, क्योंकि सम्राट होने के बाद भी उन्हें अपनी पुत्री के योग्य वर नहीं मिल पाया था। ब्रह्मा ने कहा कि आप पृथ्वी लोक वापिस चले जाओ परंतु वहां तो युग बीत चुके हैं। अब वहां कृष्ण के भ्राता बलराम से मिलें। वे ही रेवती के पति होंगे। तब तक पृृथ्वी पर द्वापर युग आ चुका था। हमारे दृश्य जगत से बाहर समय धीमा हो जाता है, उसका विस्तार हो जाता है और एक दिव्य वर्ष लाखों वर्षों के बराबर होता है।

कृष्ण ने कहा है कि वे समस्त जगत में व्याप्त हैं और जगत उनमें व्याप्त है। उपनिषदों में महाशून्य एक ऐसी स्थिति है जो कि गणितीय शून्य नहीं है, बल्कि वह महाशून्य है जहां किसी भी कण में न रूप है, न रंग है, न गंध है, न स्पर्श है और न ही कोई विकार है। उसमें अनन्त ऊर्जा है और अनन्त आकर्षण है। एक महाविस्फोट के पश्चात्, ईश्वर की इच्छा से सृष्टि का अनन्त विस्तार हुआ और एक सेकेंड के एक खरबवें हिस्से से भी कम समय में समस्त ब्रह्माण्डों ने जन्म लिया। 

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