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शनि तो बर्बाद कर देंगे।

24-08-2017

    खण्डन - अन्य ग्रहों की भांति शनि भी एक ग्रह हैं और उन्हें ब्रह्मा की सभा में स्थान प्राप्त है। उन्हें यज्ञ भाग मिलता है और श्राप या वरदान देने की शक्तियाँ प्राप्त हैं। नवग्रह मण्डल में उन्हें स्थान प्राप्त है तथा किसी भी कर्मकाण्ड में अन्य ग्रहों के साथ-साथ उनका भी आह्वान किया जाता है।

    शनि अपनी ढैया (लघु कल्याणी) और साढ़ेसाती को लेकर बहुत बदनाम हैं। पुराण कथाओं में महाराज दशरथ का उल्लेख आता है कि अपनी प्रजा को शनि द्वारा रोहिणी के शकट भेद (रोहिणी तारा मण्डल में प्रवेश) के बाद आसन्न अकाल और पीड़ा से बचाने के लिये वे शनिदेव से युद्ध करने को तैयार हो गये। महाराजा दशरथ की प्रजा वत्सलता को देखते हुये शनिदेव प्रसन्न हुये और उन्हें वरदान दिया कि  वे भविष्य में रोहिणी नक्षत्र का शकट भेद नहीं करेंगे।

    शनि के अतिरिक्त कुछ अन्य ग्रहों का भी रोहिणी तारा मण्डल में से भ्रमण शुभ नहीं बताया गया है। वास्तव में यह एक खगोलीय गणना है कि शनिदेव अपनी कक्षा में भ्रमण के समय रोहिणी नक्षत्र से बाहर ही रह जाते हैं और उसमें प्रवेश नहीं कर पाते हैं।

    शनि देव नीलवर्णी हैं -
    शनि को सूर्य और छाया से उत्पन्न माना गया है। सूर्य से दूरस्थ कथा में स्थित शनि का नीला रंग भारतीय वाङ्गमय में अति प्रतिष्ठित है। भारतीय दार्शनिक चिंतन में नीले रंग को ईश्वरीय गुणों की ओर बढ़ता हुआ माना गया है। भगवान राम और कृष्ण की छवि में इस बात की झलक मिल जाती है।
    वेदांग ज्योतिष में शनि को दण्डनायक भी कहा गया है। वे कर्मों का दण्डफल प्रदान करते हैं। ज्योतिष ग्रंथों में इस बात का विवरण मिलता है कि यदि शनिदेव योगकारक हों तो अपनी दशा में बहुत अधिक सफलता प्रदान करते हैं और भूमि और अधिकार की प्राप्ति कराते हैं। दूसरी ओर जब शनि मारकेश की श्रेणी में आते हैं तो अन्य ग्रहों को अपेक्षा स्वयं ही मारक ग्रह की भूमिका निभाते हैं, उन्हें आयु का कारक माना गया है।

    शनि की साढ़ेसाती -
    जन्मकालीन राशि से बारहवें भाव, राशि वाला भाव व उससे अगले भाव पर शनि जब कुल मिलाकर साढ़े सात वर्ष जब भ्रमण करते हैं तो इसे साढ़ेसाती कहा जाता है। जनमानस में शनि की साढ़ेसाती को लेकर बहुत अधिक भय व्याप्त है। लोग बहुत सारी भ्रांत धारणाओं के चलते भयभीत रहते हैं। सच तो यह है कि कई बार तो लोगों का भाग्योदय साढ़ेसाती के कारण ही होता है। उदाहरण के तौर पर वृश्चिक राशि में साढ़ेसाती की पहली ढैया अत्यन्त शुभ जा सकती है, मकर राशि की पहली ढैया और दूसरी ढैया तथा तीसरी ढैया भी जीवन के कई विषयों में अत्यधिक शुभ परिणाम दे सकती है। सिंह राशि की साढ़ेसाती भी अपनी आधे से ज्यादा काल में शुभ परिणाम दे सकती है। वृषभ राशि के लिये शनि की साढ़ेसाती के पहले पांच साल श्रेष्ठ जा सकते हैं।

    साढ़ेसाती के कुछ काल में कभी-कभी दु:ख आते पाये गये हैं परंतु ऐसा तो अन्य कई ग्रहों के साथ भी है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि साढ़ेसाती की प्रतीक्षा किया करते थे, जिससे कि शरीर कष्ट या अन्य भौतिकतापों से उनके पाप कर्म क्षय हों और मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो।

    शनिदेव से डरने की आवश्यकता नहीं है। वे साढ़ेसाती के समय भी आधे से अधिक मामलों में कल्याणकारी हैं। धन-दोहन के उद्देश्य से उनके प्रति अधिक भय उत्पन्न कर दिया गया है। सच तो यह है कि सार्वजनिक जीवन में भूमि, अधिकार सम्पन्नता एवं प्रतिष्ठा देने में शनि की भूमिका बहुत बड़ी है। उनकी महादशा अवधि 19 वर्ष होने के कारण सफलता का समय भी अधिक समय तक रहता है। 

पं. सतीश शर्मा, 24/08/2017
प्रधान संपादक, ज्योतिष मंथन

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