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श्री ब्रह्मचारिणी।

22-09-2017

श्री दुर्गा का द्वितीय स्वरूप श्री ब्रह्मचारिणी है। यहां ब्रह्मचारिणी का अर्थ तपश्चारिणी ही है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अत: ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। इनके दांये हाथ में जप माला और बांये हाथ में कमण्डल है। नवरात्र के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त स्वाघिष्ठान चक्र में स्थिर कर साधना करना चाहिए।

श्री ब्रह्मचारिणी के पूजन से साधक को स्वाधिष्ठान चक्र जाग्रति होने की सिद्धियाँ स्वत: प्राप्त हो जाती हैं। श्री ब्रह्मचारिणी भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाली हैं। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। इन देवी ने हजारों वर्ष तक तपस्या की और सूखे विल्वपत्र तक खाना छोड़ दिया जिसके कारण इनका नाम अपर्णा भी पड़ गया। यह देवी कठिन संघर्ष की प्ररेणा देती हैं।

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