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नवरात्रा के पंचम दिन की अधिष्ठात्री देवी स्कन्धमाता।

25-09-2017

श्री दुर्गा का पंचम स्वरूप श्री स्कन्धमाता है। शिव पुत्र श्री स्कन्ध (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कन्ध माता कहा जाता है। नवरात्र के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त विशुद्ध चक्र पर स्थित करके साधना करनी चाहिए। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियाँ स्वत: प्राप्त हो जाती हैं। श्री स्कन्धमाता की उपासना से साधक की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शान्ति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वयमेव सुलभ हो जाता है।

श्री स्कन्धमाता की उपासना से बालरूप स्कन्ध भगवान की उपासना से स्वयमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अत: साधक को श्री स्कन्धमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। यह दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा में स्कन्ध को लिये हुए है और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है, बांये तरफ की ऊपर वाली भुजा वरद मुद्रा में ेहै और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण शुभ्र हैं और यह कमल के आसन पर हैं। इन्हीं को पद्मासना भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह हैं। ये मोक्षदायिनी है और इनकी पूजा से तेज मिलता है। कालिदास ने इन्हीं की आराधना की थी।

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