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बाजारु यंत्रों को पूजा में रखने से सम्पन्नता बढ़ती है।

14-08-2017

    खण्डन - बहुत सारी पत्र-पत्रिकाएं देवी-देवताओं के और यंत्रों के ताम्रपत्र इत्यादि बेचते हैं और उन्हें सिद्ध लक्ष्मी यंत्र संज्ञाओं से प्रचारित करते हैं। सामान्यजन इन उपहार में प्राप्त यंत्रों को या बाजार से खरीदे ताम्रपत्र को लाकर अपने पूजा स्थान में रख लेते हैं और यह कामना करते हैं कि इससे सुख-समृद्धि बढ़ेगी।

    यंत्र संबंधी इस धारणा पर बाजारी शक्तियाँ हावी हो गयी हैं। सच तो यह है कि विधिवत सिद्ध किये बिना कोई भी मंत्र किसी भी भांति के परिणाम नहीं देता। मंत्र महार्णव ग्रन्थ के अनुसार किसी भी भांति के यंत्र को सिद्ध करने की एक निश्चित क्रिया प्रणाली है और उस विधान के पूर्ण होने पर ही मंत्र को सिद्ध किया जा सकता है। मंत्र महार्णव ग्रन्थ के एकादश तरंग से ही एक प्रमाण को यह उद्धृत किया जा रहा है -

जपादस्य भवेत्सिद्धो यंत्रराजस्त्रिवर्गक:
    यंत्र त्रिवर्गात्मक है, जप करने से ही सिद्ध होता है।

आदो कुर्यात्पुरश्चर्या साधक: सिद्धिहेतवे।
    पुरश्चरणहीनस्य यन्त्र: सिद्धिर्न जायते।।

    यंत्र की साधना अथवा पूजा करने वाला साधक पहले यंत्र संबंधी मंत्र का पुरश्चरण करे, क्योंकि जो पुरश्चरण नहीं करता है उसे सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

लेखने यंत्रराजस्य भूरि विघ्ना भवन्ति हि।
    क्वचिच्चटपटाशब्दश्तालशब्द: क्वचिद्भवेत्।।

    यंत्र लेखन में बहुत विघ्न उत्पन्न होते हैं और उन विघ्नों से निर्भयता केवल जप मात्र की सिद्धि से ही प्राप्त हो सकती है।

    बात यहीं तक सीमित नहीं है। जीवन भर आदमी यंत्रों का संग्रह करता रहता है और ला-लाकर अपनी पूजा के स्थान पर रख देता है। इन्हें घर से बाहर ले जाकर कहीं फेंक देने में भी डर लगता है। सामान्यजन के लिये भ्रांत धारणाओं से भी उभरकर बाहर आना अत्यंत दुष्कर कार्य है। इससे अपने इष्ट के प्रति एकाग्रता भी भंग होती है और शुभ परिणाम नहीं आने से असंतोष भी जन्म लेता है।

अत: बिना सिद्ध किये यंत्रों को घर में लाकर नहीं रखना चाहिये, क्योंकि यह कोई फल प्रदान नहीं करते।

पं. सतीश शर्मा, 14-08-2017
मुख्य संपादक, ज्योतिष मंथन

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